रफाल: भाजपा इसलिए नहीं बैठाना चाहती JPC जांच, गठित होने पर सत्‍ता खो देने का है ‘डर’

नई दिल्‍ली। रफाल सौदे के मुद्दे पर मोदी सरकार और कांग्रेस के बीच सियासी संग्राम जारी है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी मोदी सरकार को राहत नहीं मिली। उल्‍टे शीतकालीन संसदीय सत्र के दौरान कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को जमकर घेरने का काम किया है। राहुल गांधी लगातार संयुक्‍त संसदीय समिति (जेपीसी) की मांग पर अड़े हुए हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब मोदी सरकार खुद को पाक-साफ मानती है तो उसे जेपीसी गठित करने से डर क्‍यों लगता है? मोदी सरकार कांग्रेस की इस मांग को मानने से क्यों बच रही है?

दरअसल, पिछले 70 सालों में छह बार जेपीसी गठित हुई। जेपीसी का इतिहास यह है कि जिस सरकार ने जेपीसी गठन को मंजूरी दी उसी की सरकार दोबारा सत्‍ता में नहीं आई। बोफोर्स तोप सौदे से लेकर 2जी स्‍पेक्‍ट्रम तक का इतिहास तो कम से कम यही कहानी बयां करता है।

1. 1987 में बोफोर्स कांड 
अगस्त, 1987 में बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के आरोपों की जांच के लिए पहली बार जेपीसी का गठन हुआ। राजीव गांधी सरकार में रक्षा मंत्री केसी पंत ने लोकसभा में 6 अगस्त, 1987 को जेपीसी का प्रस्ताव दिया। एक हफ्ते बाद 12 अगस्त को राज्यसभा ने भी इस पर मुहर लगाई। जिसके बाद सरकार ने कांग्रेस नेता बी शंकरानंद के चेयरमैनशिप में जेपीसी गठित कर दी। 26 अप्रैल ,1988 को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी। जेपीसी ने अपने रिपोर्ट में कांग्रेस की सरकार को क्लीन चिट दे दी। कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि 155 एमएम के 400 तोपों की खरीद के लिए हुई 1700 करोड़ की डील में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। बोफोर्स जांच पर गठित जेपीसी ने कांग्रेस सरकार को दलाली के सारे आरोपों से बरी कर दिया। लेकिन विपक्ष ने जेपीसी की रिपोर्ट को खारिज कर दिया। जेपीसी में शामिल ज्यादातर सांसद कांग्रेस के थे। इसी सवाल को उठाते हुए विपक्ष ने संसद में इस जांच रिपोर्ट के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया और राजीव गांधी की दोबारा सरकार नहीं बनी।

2. 1992 में प्रतिभूति घोटाला 
1990 के दशक में हुए शेयर मार्केट घोटाले ने पूरे देश में सनसनी मचा दी थी। इस घोटाले के मास्टरमाइंड हर्षद मेहता के कारनामों के छींटे तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर भी पड़े। हर्षद मेहता ने ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि मामले से बच निकले के लिए उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव को पार्टी फंड के नाम पर एक करोड़ रुपए की घूस दी थी। इस घोटाले को लेकर दूसरी बार जेपीसी गठित हुई। अगस्त 1992 में जेपीसी गठित हुई थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामनिवास मिर्धा को जेपीसी का चेयरमैन बनाया गया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के संसदीय कार्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने लोकसभा में जेपीसी को लेकर प्रस्ताव रखा था। इसके अगले दिन राज्यसभा ने भी इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। इस मामले में जेपीसी के दिए प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव को देश को नब्बे के दशक के आर्थिक संकट से निकालने का श्रेय दिया गया लेकिन 1996 में हुए चुनाव में देश की जनता ने कांग्रेस सरकार को नकार दिया।

3. 2001 के केतन पारेख शेयर मार्केट घोटाला 
अप्रैल, 2001 में केतन पारेख शेयर मार्केट घोटाले का खुलासा होने के बाद में तीसरी बार जेपीसी का गठन हुआ था। तत्कालीन वाजपेयी सरकार में संसदीय कार्यमंत्री रहे प्रमोद महाजन ने 26 अप्रैल, 2001 को लोकसभा में जेपीसी का प्रस्ताव दिया थ। भाजपा वरिष्‍ठ नेता प्रकाश मणि त्रिपाठी को जेपीसी का चेयरमैन नियुक्त किया था। इस मामले में 105 बार कमिटी की बैठक हुई। जेपीसी ने 19 दिसंबर, 2002 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। जेपीसी ने शेयर मार्केट के नियम कायदों में बदलाव के कई प्रस्ताव दिए और वाजपेयी सरकार को बरी कर दिया। लेकिन भाजपा इंडिया शाइनिंग के बाजवूद चुनाव हार गई।

4. 2003 में सॉफ्ट ड्रिंक्स घोटाला 
एक बार फिर 2003 में वाजपेयी सरकार के दौरान ही सॉफ्ट ड्रिंक्स में पेस्टिसाइड्स मिले होने पर जेपीसी का गठन हुआ था। उस वक्त पहली बार खुलासा हुआ था कि सॉफ्ट ड्रिंक्स, फ्रूट जूस और दूसरे पेय पदार्थों में पेस्टिसाइड्स मिलाए जा रहे हैं, जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं। पेय पदार्थों के स्टैंडर्ड तय करने के लिए अगस्त 2003 में सरकार ने जेपीसी गठित की। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को कमिटी का चेयरमैन बनाया गया। कमिटी ने इस मामले में 17 बैठकें कीं। चार फरवरी, 2004 को इसने अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपी। जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में माना कि पेय पदार्थों में तय मात्रा से ज्यादा पेस्टिसाइड्स मिलाए जा रहे हैं और इस बारे में कुछ सख्त प्रस्ताव दिए। सरकार भी रिपोर्ट को मानने को राजी हो गई।

5. 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला 
यूपीए टू सरकार के दौरान मनमोहन सिंह सरकार पर 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले का आरोप लगा। सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया था कि गलत तरीके से 2जी आवंटित किए जाने की वजह से सरकार को डेढ़ लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा का चूना लगा। सीएजी की रिपोर्ट पर मनमोहन सरकार को विपक्ष ने जबरदस्त राजनीतिक हमले किए। फरवरी 2011 में मनमोहन सरकार ने इस मामले में पांचवी जेपीसी गठित की। कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता पीसी चाको को कमिटी का चेयरमैन बनाया गया। जेपीसी में शामिल विपक्षी पार्टी के सांसदों ने पीसी चाको पर पक्षपात करने के आरोप लगाए। हालांकि रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम को सभी आरोपों में क्लीन चिट दे दी गई थी। बावजूद इसके लिए कांग्रेस सत्‍ता में नहीं लौट सकी।

6. 2013 के वीवीआईपी चॉपर घोटाला 
अन्‍ना आंदोलन के समय 2013 में वीवीआईपी चॉपर के लिए अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी के साथ हुई डील में घोटाला प्रकाश में आने के बाद मनमोहन सिंह सरकार पर एक और दाग लगा दिया। 3600 करोड़ रुपए के 12 हेलीकॉप्टर्स की खरीद में 362 करोड़ रुपए की घूस दी गई। संसद में इस डील को लेकर खूब हंगामा मचा जिसके बाद 27 फरवरी, 2013 को तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री कमल नाथ ने इस मामले में जेपीसी गठन की घोषणा की। 30 सदस्यों वाली जेपीसी की पहली बैठक के तीन महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया। इस घोटाले के पांच साल भी आरोपों से कांग्रेस मुक्‍त नहीं हो पाई है।

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