तो क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में आरक्षण बनाम आरक्षण होगा मुद्दा?

मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों को 10% आरक्षण देने संबंधी 124वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवा लिया. इसके साथ ही एक नई बहस शुरू हो गई है. ये बहस है जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक कर सबको उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण  देने की. खुद सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल ने यह मांग उठाई. कुछ दिन पहले एनडीए छोड़कर यूपीए का दामन थामने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने भी जातियों की संख्या के हिसाब से आरक्षण मांगा. सियासी जानकारों का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे ऊपर आरक्षण बनाम आरक्षण का का मुद्दा होगा. (ये भी पढ़ें: सवर्णों के दस फीसदी आरक्षण की चर्चा के बीच कैसे आ गया ‘मुंगेरीलाल’)

राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया का कहना है कि सरकार ने आरक्षण का जिन्न बोतल से निकाल दिया है, अब यह क्या-क्या करेगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इसे वापस बोतल में बंद करना मुश्किल होगा. देखिए अब आरक्षण से जुड़ी किस-किस तरह की मांग होती है, कौन-कौन उठाता है. निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग उठ रही है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि सरकारी नौकरियां कितनी हैं? इस सवाल का जवाब मिले बिना आरक्षण का कोई मतलब नहीं है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार का कहना है कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण देने के बाद अब सरकार पर जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने का दबाव बनेगा. ओबीसी समुदाय, जिसे उसकी आबादी के अनुपात में लगभग आधा ही आरक्षण मिला हुआ है वह अब अपने पूरे हक के लिए मांग करने लग गया है. लोकसभा में मुद्दा उठ रहा है.(ये भी पढ़ें: मोदी सरकार ने क्यों चला सवर्णों को आरक्षण का दांव, क्या संविधान देता है इजाजत? )

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