फूलपुर उपचुनाव: क्या केशव प्रसाद मौर्य की विरासत बचा पाएंगे कौशलेन्द्र?

2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार केशव प्रसाद मौर्य ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सीट रही फूलपुर पर कमल खिलाया था. अब उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए बीजेपी ने कौशलेन्द्र सिंह पटेल को मैदान में उतारा है. केशव प्रसाद मौर्य ने इस सीट को तीन लाख से ज्यादा के अंतर से जीता था. पटेल बाहुल्य इस सीट पर कौशलेन्द्र के लिए न सिर्फ जीत एक चुनौती है, बल्कि भारी मतों से जीत भी हासिल करना है.

फूलपुर में 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने 3 लाख से ज्यादा मतों से सपा के धर्मराज सिंह पटेल को मात दी थी. अब कौशलेंद्र सिंह पटेल के सामने इस बड़ी जीत को दोबारा पार्टी की झोली में डालने की चुनौती है.

हालांकि कौशलेंद्र के लिए राहें इतनी आसान भी नहीं दिख रही हैं. फूलपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं में कौशलेंद्र के प्रत्याशी घोषित होने पर नाराजगी देखने को मिल रही है. उनका कहना है कि स्थानीय नेता की बजाए पार्टी ने पैराशूट कैंडीडेट खड़ा किया गया है. दबी जुबान में चर्चा है कि जिन्होंने टिकट की आस लगाई थी, उन्हें तगड़ा झटका लगा है. मामले में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पैराशूट कैंडीडेट की बात पर कहते हैं कि कौशलेंद्र पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता हैं. वह काफी समय से संगठन से जुड़े रहे हैं और उनकी छवि भी साफ सुथरी है. एक तेजतर्रार युवा नेता होने के नाते कौशलेंद्र को पार्टी ने मौका दिया है.

फूलपुर सीट पर इतिहास की बात करें यहां से छह बार पटेल (कुर्मी) बिरादरी का कब्जा रहा है. समाजवादी पार्टी से नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल और अब बीजेपी से कौशलेंद्र सिंह पटेल के प्रत्याशी घोषित होने के बाद फूलुपर लोकसभा सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है. दोनों ही पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों के माध्यम से पटेल वोटों पर सीधा निशाना साधा है.

जातीय गणित की बात करें तो फूलपुर में यादव के बाद कुर्मी, लोध और कुशवाहा जातियां सबसे अहम हैं. इनमें लोध बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है. वहीं, केशव मौर्य की कुशवाहा जाति में अच्छी पकड़ मानी जाती है. दरअसल फूलपुर में शहर उत्तरी और शहर पश्चिमी विधानसभा सीटें जुड़ने के बाद यहां मुस्लिम, पटेल और कायस्थ बिरादगी के सबसे अधिक वोट हो गए हैं. इसके बाद ब्राह्मण और अनुसूचित जाति वोट आते हैं. पटेल मतदाताओं की संख्या करीब सवा दो लाख हैं. मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है. वहीं लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं.

बीजेपी के लिए सबसे फायदेमंद बात ये है कि उसका अपना दल सोनेलाल पार्टी से गठबंधन है. कभी सोनेलाल पटेल ने यहां से चुनाव लड़ा था. उन्हें पटेलों का अच्छा समर्थन भी मिला. लेकिन बीजेपी को ब्राह्मण वोट बैंक में बंटवारे से बचना होगा. कारण ये है कि कांग्रेस ने मनीष मिश्रा को प्रत्याशी के रूप में उतारा है. उनकी भी ब्राह्मण वोटबैंक में अच्छी पकड़ मानी जाती है. उधर सपा के लिए मुस्लिम वोट बंटवारे को रोकना एक बड़ी चुनौती होगी. क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस पर सपा से ज्यादा विश्वास जताने का ट्रेंड रहा है. और ये लोकसभा उपचुनाव ही है.

मामले में बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि सामान्य तौर पर उपचुनावों में ये ट्रेंड रहा है कि यहां वोटिंग प्रतिशत कम रहता है. इसी को लेकर बीजेपी का इस बार प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों का मतदान करें. उन्होंने कहा कि कौशलेंद्र की फूलपुर में विजय महज औपचारिकता मात्र है. हमारी कोशिश पिछले जीत के अंतर को और अधिक बढ़ाना है.

वहीं जहां तक बाहरी कैंडीडेट उतारने की बात है तो कौशलेंद्र 2006 में वाराणसी से सबसे कम उम्र के मेयर रहे. उससे पहले और उसके बाद वह प्रदेश स्तर के दायित्वों का निर्वहन करते रहे हैं. वह प्रदेश के कई जिलों में दायित्वों का निर्वहन करते रहे हैं.

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