देखना या महसूस करना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना की विश्वास और उम्मीद है: मोहित जौहरी

कलम की दस्तक हुई और सोंच आपसे मुखातिब:
मित्रों देखना , मेहसूस करना, विश्वास और उम्मीद का परिचय करा दूँ की वास्तविकता में यह तथ्य है क्या आखिर?

देखना: सामान्यतः देखना मात्र से हम यह समझते है कि जो हम निगाह से अपने समक्ष समझे उसे हम दिखता हुआ समझ लेते हैं।

महसूस: जिसका एहसास हुआ हो।

विश्वास: किसी बात, विषय, व्यक्ति के संबंध में मन में होनेवाली यह धारणा कि यह ठीक, प्रामाणिक या सत्य है, अथवा उसे हम जैसा समझते हैं, वैसा ही है, उससे भिन्न नहीं है।

उम्मीद:आशा,यानी आसरा ।।

अब दुबारा उसी वाक्य पर आता हूँ की “मेरे लिए देखना या महसूस करना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना की विश्वास और उम्मीद है। ”

यहाँ मेरे अनुसार जीवन में देखना और महसूस करना एक सामान्य इंसान अपने जीवन पर्यत्न करता है।
जो दिखा उसे ही महसूस कर लिया पर उसका देखना और महसूस करना उसके भविष्य से कोई तालमेल नही रखता ,यहीं आकर हम आने वाले कल के लिए कोई नीति नही बना पाते।
अक्सर हमारे समक्ष आ रहीं परिस्थितियों को हम सामान्यतः लेते हुए उन्हें सिर्फ देखते मात्र है पर उस संकीर्ण विचारधारा के चक्रव्यूह को अनजाना करते हुए उसकी वजह को अनदेखा कर देतें हैं।
यह विश्लेषण नही करते की यह विषम परिस्थिति हमारे समक्ष आखिर क्यों हैं?
हम अगर ध्यान दें कि हमारा आज हमारे बीते हुए कल के क्रियाकलापों से है और हमारा आने वाला कल हमारे आज के नज़रिए से तय होगा।

सिर्फ हम खुद ही तय करतें है कि हम आने वाले कल की क्या तैयारी करें।
जिस प्रकार हमारा बीते हुए कल पर कोई अधिकार और दखलंदाज़ी नही उसी तरह हम अपना अधिकार और दखलंदाज़ी आने वाले कल के लिए भी खोते जा रहें अपने इस संकीर्ण नज़रिये से।।

विश्वास तभी जन्म लेगा जब हम यह निश्चित कर लेंगे की हम खुद से क्या चाह रहें।

खुद से उम्मीद रखें क्योंकि उम्मीद अगर आज हम खुद की पूरी न कर पाए तो दुनिया की उम्मीदों को पूरा कैसे करेंगे।

सिर्फ नज़रिये में बदलाव चाहिए वो भी वैसा बदलाव जैसा हम खुद के लिए चाहते हैं।
अगर हम सोंच लें और विचार कर लें कि हम किस तरह की ज़िंदगी खुद के लिए चाहते है,फिर खुद के जो निर्णय है उसका विश्लेषण करें की क्या हम आज वो कर रहें है जो हमे उस मुकाम तक के सफर को पूरा करायेगा?

उम्मीद का जन्म विश्वास की कोख में होता है

खुद से उम्मीद तभी जन्मेगी जब अपने निश्चय पर यकीन कर पाएंगे।

अवसर आने और अवसर बनाने में अंतर हैं..

सामान्य व्यक्ति अवसर का इंतज़ार करता है और कुछ कऱ गुजरने की कूवत रखने वाले अवसर बनातें हैं।

कुछ अलग पाने के लिए कुछ अलग नही सिर्फ नज़रिये को अलग करने की ज़रूरत है।
आज जो भी भटकाव है वो सिर्फ और सिर्फ नज़रिये की वजह से है।
चाहें वो छात्र हो ,नौकरी पेशा हो या व्यापार हो अंतर है तो सिर्फ नज़रिये का।
एक ही कक्षा में पढ़ रहे हर छात्र का नज़रिया अलग,एक ही किस्म का व्यापार कर रहे लोगों का नज़रिया अलग ।
अगर ऐसा न हो तो सब कामयाब हो जाएं।

जीवन में ईश्वर ने हर किसी को एक ही सा बनाकर भेजा ,जिसने खुद को तराशा उसने अपने आने वाले कल को तराश लिया।

कुछ अलग पाने के लिए कुछ अलग नही सिर्फ नज़रिये को अलग करने की ज़रूरत है।
आज जो भी भटकाव है वो सिर्फ और सिर्फ नज़रिये की वजह से है।
चाहें वो छात्र हो ,नौकरी पेशा हो या व्यापार हो अंतर है तो सिर्फ नज़रिये का।
एक ही कक्षा में पढ़ रहे हर छात्र का नज़रिया अलग,एक ही किस्म का व्यापार कर रहे लोगों का नज़रिया अलग ।
अगर ऐसा न हो तो सब कामयाब हो जाएं।

जीवन में ईश्वर ने हर किसी को एक ही सा बनाकर भेजा ,जिसने खुद को तराशा उसने अपने आने वाले कल को तराश लिया।

हमें यह समझना होगा की जो कुछ भी चाहें भला या बुरा ,हमारे सामने है तो उसे सिर्फ देख करके महसूस करें यह उचित नहीं।
न्याय और तर्क संगत यह है कि हम यह जानने की कोशिश करें की आखिर वजह क्या है।

उस वजह पर ही काम करना हैं।अपने आज और आने वाले कल में सामंजस्य बैठाएं।
सामंजस्य भी तभी बैठा पाएंगे जब खुद से उम्मीद और खुदपर विश्ववास होगा।

आने वाले कल को खुद के वर्तमान के कर्मों से बनाएं।

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