न हिंदू को सुकूँ है न मुसलमान को है चैन, सियासत मज़े में थी सियासत मज़े में है:मोहित जौहरी

#शहादत #शहीद

#घटिया #राजनीति

न हिंदू को सुकूँ है न मुसलमान को है चैन
सियासत मज़े में थी सियासत मज़े में है ..

जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के तंगधार में आतंकियों से लोहा लेते हुए सोमवार को शहीद हुए मथुरा के खुटिया नगला गांव के पुष्पेंद्र सिंह के अंतिम संस्कार के लिए जब राजस्व अधिकारी सड़क किनारे की ठीकठाक जमीन उपलब्ध कराने के लिए गांव का नक्शा लेकर विचार कर रहे थे तब उसी गांव के निवासी नज़ीम खान ने आगे बढ़कर इस कार्य के लिए अपनी भूमि उपलब्ध करा दी.

#फौजी

वे एक ही सपना लिए अपने परिवार से दूर मुश्किल हालात में ड्यूटी करते हैं। यह सपना होता है- परिवार के सपनों को पूरा करना। अम्मा-बापू की दवा-दारू में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, पत्नी कभी उदास नहीं होनी चाहिए, बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए, फलां रिश्तेदार की शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, वगैरह-वगैरह।

इनसे अलग एक और ख्वाहिश- एक छोटा सा घर बनाना है, जहां रिटायरमेंट के बाद आराम से रहा जाएगा। फुरसत में जवान सोचता होगा कि रिटायर होने पर बूढ़े मां-बाप की सेवा करूंगा, पत्नी और बच्चों को जो वक़्त नहीं दे पाया, उसकी भरपाई करूंगा। जिस जगह बचपन बीता था, वहीं पर बुढ़ापा गुज़ारूंगा। उन्हीं खेतों में घूमूंगा, उन्हीं पेड़ों पर चढूंगा, उन्हीं रास्तों से गुजरूंगा।

मगर अचानक एक गोली, एक धमाका और सब ख़त्म। सब सपने भी गायब। आखिर में तिरंगे में लिपटकर वह फिर उसी आंगन में आता है, उन्हीं गलियों से गुजरता है; मगर कुछ देख नहीं सकता, महसूस नहीं कर सकता। ज़िन्दगी ख़त्म, तो सब ख़त्म। किसी चीज़ का कोई मतलब नहीं होता। बंदूक की फायरिंग के साथ सलामी और ‘अमर रहे’ जैसे नारों का भी नहीं। कभी शहीद जवान की जगह खुद को या अपने किसी करीबी को रखकर सोचिए, मेरी बात समझ आ जाएगी

किसी हादसे में मौत हो जाए, बात समझ में आती है कि इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता। मगर इस तरह से किसी की जान नहीं जानी चाहिए। इंसान की इंसान के हाथों हुई ये मौत हत्या है। यह सिलसिला बंद होना चाहिए। जमीन के टुकड़ों या चन्द लोगों की सनक की राजनीति न जाने ऐसी कितनी ही मौतों के लिए जिम्मेदार है। संख्या में गिनती होती है कि आज फ्लां जगह पर इतने जवान शहीद, फेसबुक पर RIP टाइप होता है और फिर सब नॉर्मल।

दर्द को महसूस करना शुरू कीजिए। ओ नेताओ, अब तक जो होता रहा, वो तो हो गया। आगे हम क्या और कैसे सही कर सकते हैं, यह सोचिए। इतिहास की नहीं, भविष्य की चिंता कीजिए। निपटाइए ये झगड़े, सुलझाइए ये विवाद। यथास्थिति बनाए रखकर आप जवानों की ज़िन्दगी से खेल रहे हैं। अपनी नाकामी और अक्षमता की बलि चढ़ा रहे हैं आप उन्हें।

#सियासत के लिए महज़ खेल हैं हम
बाँटा जा रहा है ताश के पत्तों की तरह

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